जसवंत सिंह खालड़ा की इंसाफ की लंबी लड़ाई, 135 पुलिसकर्मियों को मिल चुकी है सजा
- पंजाब
- (Asia/Kolkata)
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों को उजागर करने के लिए लड़ी गई कानूनी लड़ाई एक बार फिर चर्चा में है। उनके जीवन पर आधारित फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम 'पंजाब 95') पर नई पाबंदी लगाए जाने के बाद न्याय की मांग फिर से जोर पकड़ने लगी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब तक इन मामलों में पंजाब के करीब 135 पुलिसकर्मियों को सजा सुनाई जा चुकी है, जिनमें अधिकांश निचले रैंक के कर्मचारी हैं। फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाने वाले अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि खालड़ा को अपनी मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी न्याय नहीं मिल सका। उन्होंने यह टिप्पणी फिल्म पर लगाए गए नए प्रतिबंध के संदर्भ में की। जसवंत सिंह खालड़ा ने 1990 के दशक की शुरुआत में दावा किया था कि 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के शुरुआती दौर में आतंकवाद के समय पंजाब पुलिस द्वारा कथित फर्जी मुठभेड़ों में लगभग 25,000 निर्दोष युवकों की हत्या की गई थी। उनका आरोप था कि इन लोगों के शवों का लावारिस बताकर अंतिम संस्कार किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के बाद सितंबर 1995 में खालड़ा का भी कथित रूप से अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई। उनका शव आज तक बरामद नहीं हो सका। पुलिस और फर्जी मुठभेड़ों से जुड़े मामलों की पैरवी करने वाले वकीलों के अनुसार, अब तक करीब 135 पुलिसकर्मियों को विभिन्न मामलों में कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है। वर्ष 2005 में पटियाला की सीबीआई अदालत ने खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में छह पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया था। डीएसपी जसपाल सिंह और एएसआई अमरजीत सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जबकि एसएचओ/सब-इंस्पेक्टर सतनाम सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह और हेड कांस्टेबल प्रीतपाल सिंह को अपहरण और साजिश के आरोप में सात-सात वर्ष की सजा दी गई। हालांकि, जिन कथित फर्जी मुठभेड़ों के मामलों को खालड़ा ने उजागर किया था, उनमें से कई मामलों की सुनवाई लंबे समय तक लंबित रही। इन मामलों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता सरबजीत सिंह वेरका ने कहा कि न्याय मिलने में दशकों की देरी हुई, जिससे पीड़ित परिवारों की परेशानियां और बढ़ीं। उन्होंने बताया कि खालड़ा के लापता होने के बाद तत्कालीन एसजीपीसी अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहड़ा ने सुप्रीम कोर्ट को तार भेजकर जांच की मांग की थी। इसके बाद न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सीबीआई को जांच के निर्देश दिए। जांच एजेंसी ने 2,087 मामलों की पहचान की और वर्ष 2001 में 70 एफआईआर दर्ज कीं। हालांकि, अभियोजन की सरकारी मंजूरी नहीं मिलने के कारण सुनवाई लगभग 25 वर्षों तक अटकी रही। इस दौरान अकाली दल के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने पुलिस विभाग के भीतर एक कानूनी प्रकोष्ठ बनाया, ताकि आरोपित अधिकारियों का बचाव किया जा सके और उनके कानूनी खर्च वहन किए जा सकें। वहीं, कई पीड़ित परिवारों ने अपने मुकदमे लड़ने के लिए जमीन और अन्य कीमती संपत्ति तक बेच दी। वेरका के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2020 में अभियोजन की मंजूरी मिलने पर मामलों में तेजी आई और पिछले दो वर्षों के दौरान लगातार सजा सुनाई गई। 70 एफआईआर में से छह मामलों की सुनवाई अभी भी जारी है, जबकि 64 मामलों में फैसला आ चुका है। इनमें केवल एक मामले में आरोपितों को बरी किया गया। उन्होंने कहा कि न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी काफी काम बाकी है। उनके अनुसार, पंजाब पुलिस द्वारा गंभीर अपराध किए गए थे, लेकिन दूसरी ओर सीबीआई ने विस्तृत जांच कर कई मामलों में न्याय सुनिश्चित किया। उन्होंने यह भी कहा कि जिन परिवारों ने अपने युवा बेटे खो दिए, वे 32 वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे, लेकिन उन्हें अभी तक पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है और कुछ लोगों का मानना है कि दोषियों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी। सजा पाने वाले अधिकांश पुलिस अधिकारी निचले रैंक के थे। वरिष्ठ अधिकारियों में डीआईजी बलकार सिंह सिद्धू, दिलबाग सिंह, कुलतार सिंह और बसरा के अलावा एसएसपी भूपिंदर सिंह, अमरजीत सिंह तथा सुरिंदर पाल सिंह के नाम भी शामिल हैं। दूसरी ओर, पंजाब पुलिस वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव महिंदर सिंह का कहना है कि जिन पुलिसकर्मियों को सजा मिली, वे भी उस दौर के आतंकवाद और व्यवस्था की परिस्थितियों के शिकार थे। उनके अनुसार, निचले रैंक के पुलिसकर्मी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन कर रहे थे और उनके पास स्वतंत्र निर्णय लेने या अपने स्तर पर कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि इन पुलिसकर्मियों के परिवार सरकार से आर्थिक सहायता और मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
Leave a Reply