Plastic Notes: नकली नोटों पर लगाम के लिए ऑस्ट्रेलिया ने शुरू किए थे प्लास्टिक नोट, अब भारत की तैयारी

Plastic Notes: नकली नोटों पर लगाम के लिए ऑस्ट्रेलिया ने शुरू किए थे प्लास्टिक नोट, अब भारत की तैयारी

देश में जल्द ही लोगों को ₹10 और ₹20 के नए पॉलिमर (प्लास्टिक) नोट देखने को मिल सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इन दोनों मूल्यवर्ग के 100-100 करोड़ यानी कुल 200 करोड़ पॉलिमर नोट छापेगा। यह प्लास्टिक करेंसी का फील्ड ट्रायल होगा। यदि यह सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोट भी इस तकनीक के तहत जारी किए जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में जानकारी दी कि यदि फील्ड ट्रायल सफल रहता है तो भारतीय रिजर्व बैंक ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोट नियमित रूप से जारी करेगा। लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में उन्होंने बताया कि RBI के केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश पर भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 25 के तहत केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था। सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कागजी नोटों को पूरी तरह पॉलिमर नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। पॉलिमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं और इनकी नकली प्रतियां तैयार करना भी अधिक कठिन माना जाता है। इनकी आयु कागजी नोटों से लगभग दो से पांच गुना अधिक हो सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत ने वर्ष 2012 में भी पॉलिमर नोट शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1988 में पॉलिमर नोट जारी करने वाला दुनिया का पहला देश बना था, जिसके बाद कई अन्य देशों ने भी इस तकनीक को अपनाया। ऑस्ट्रेलिया में क्यों शुरू हुए थे प्लास्टिक नोट? वर्ष 1966 में ऑस्ट्रेलिया ने पाउंड मुद्रा की जगह ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को अपनाया। उस समय नए नोटों में आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं शामिल थीं, लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर बाजार नकली $10 के नोटों से भर गया। असली और नकली नोटों में अंतर करना मुश्किल हो गया था। दिलचस्प बात यह रही कि इस जालसाजी के पीछे कोई बड़ा गिरोह नहीं, बल्कि केवल चार लोग थे—एक दुकानदार, एक कलाकार, एक फोटोग्राफर और एक दर्जी। फोटोग्राफर ने असली नोट की तस्वीर तैयार की, कलाकार ने उसके वॉटरमार्क की नकल बनाई और दर्जी ने एक सप्ताह की प्रिंटिंग ट्रेनिंग लेकर मेलबर्न में दुकानदार के गैरेज से नकली नोट छापने शुरू कर दिए। इस पूरे रैकेट को रॉबर्ट किड नामक अपराधी वित्तीय सहायता दे रहा था। जब इस गिरोह का पर्दाफाश हुआ तो सरकार इस बात से चिंतित हो गई कि नोटों की इतनी आसानी से नकल की जा सकती है। इसके बाद वर्ष 1968 में ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. हरबर्ट कूम्ब्स ने देश के प्रमुख वैज्ञानिकों को ऐसा नोट विकसित करने का जिम्मा सौंपा जिसकी नकल करना लगभग असंभव हो। करीब 20 वर्षों के शोध के बाद वैज्ञानिकों ने पॉलिमर नोट विकसित किया। जनवरी 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का पहला प्लास्टिक नोट जारी किया। बाद में इस तकनीक का निर्यात 25 से अधिक देशों को किया गया। क्या होते हैं पॉलिमर नोट? भारत में वर्तमान में करेंसी नोट विशेष प्रकार के कागज से बनाए जाते हैं, जबकि पॉलिमर नोट उच्च गुणवत्ता वाले विशेष प्लास्टिक से तैयार किए जाते हैं। यह सामान्य घरेलू प्लास्टिक नहीं होता। बैंक नोटों के निर्माण में बायएक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) नामक विशेष पॉलिमर का उपयोग किया जाता है, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से बनाया जाता है। यह सामग्री सामान्य प्लास्टिक की तुलना में अधिक मजबूत, लचीली और टिकाऊ होती है। इसकी विशेषता यह है कि खींचने पर भी इसका आकार आसानी से नहीं बदलता, जिससे नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं।