खाड़ी तनाव का असर: भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार धीमी
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष का असर अब भारत के औद्योगिक क्षेत्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मिसाइल हमलों और बमबारी की घटनाएं भले ही दूर हो रही हों, लेकिन उनकी आंच देश के औद्योगिक केंद्रों तक पहुंच रही है। इस वैश्विक तनाव ने भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार को धीमा कर दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में भारत का मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) घटकर 53.8 पर आ गया है, जो पिछले 54 महीनों का सबसे निचला स्तर है। फरवरी में यह 56.9 पर था। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि उत्पादन की गति कम हुई है, नए ऑर्डर घटे हैं और लागत में लगातार वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य कारण वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान है। लाल सागर मार्ग प्रभावित होने के कारण जहाजों को अब अफ्रीका के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है, जिससे माल की डिलीवरी में 15 से 20 दिनों की देरी हो रही है। इसके साथ ही शिपिंग लागत भी तीन गुना तक बढ़ गई है। हरियाणा के पानीपत में कंबल और दरी उद्योग को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। निर्यात के लिए भेजे गए कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं, जबकि शिपिंग लागत 1500-2000 डॉलर से बढ़कर 5000 डॉलर से अधिक हो गई है। इसके अलावा, ईरान और इराक जैसे देशों से भुगतान में देरी के कारण छोटे व्यापारियों के सामने नकदी संकट खड़ा हो गया है। पंजाब और हरियाणा के बासमती चावल निर्यातकों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ईरान, जो भारतीय बासमती का सबसे बड़ा खरीदार है, ने फिलहाल नए सौदे रोक दिए हैं। इससे करनाल और कुरुक्षेत्र की मंडियों में स्टॉक जमा हो गया है। लंबी समुद्री यात्रा के कारण चावल की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है। अंबाला की साइंस मार्केट, जहां करीब 2,000 इकाइयां कार्यरत हैं, भी इस संकट से अछूती नहीं है। प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि के कारण कांच उद्योग की उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। कच्चे माल जैसे कांच, पीतल और स्टील की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने लागत को और बढ़ा दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर पर असर पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भी एक बड़ा कारण बनकर उभरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 95 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने की ओर हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 80 प्रतिशत तेल आयात करता है, जिससे परिवहन लागत बढ़ रही है और इसका सीधा असर उत्पादों की कीमतों पर पड़ रहा है। पंजाब के लुधियाना और जालंधर के उद्योग भी प्रभावित हुए हैं। लुधियाना के होजरी और टेक्सटाइल सेक्टर में निर्यात ऑर्डर में लगभग 30 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि भुगतान भी अटका हुआ है। वहीं जालंधर के हैंड टूल्स और स्पोर्ट्स उद्योग में कच्चे माल की कीमतों में 20-25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी से मुनाफा प्रभावित हुआ है। डिलीवरी का समय भी 30 दिनों से बढ़कर 50 दिन तक पहुंच गया है। लुधियाना का साइकिल उद्योग भी कच्चे माल की कमी और रबर की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। उद्योग संगठनों के अनुसार, यदि स्थिति अप्रैल तक बनी रही तो कई इकाइयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र में फार्मा उद्योग पर भी लागत का दबाव बढ़ गया है। कच्चे माल की कीमतों में 40 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पैकेजिंग और परिवहन लागत भी बढ़ी है। कीमत नियंत्रण नीति के चलते कंपनियां दवाओं के दाम नहीं बढ़ा पा रही हैं, जिससे घाटा बढ़ रहा है। चंडीगढ़ में लॉजिस्टिक्स और सर्विस सेक्टर पर भी इसका असर पड़ा है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत में 10-12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका असर दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। आईटी और बैंकिंग सेक्टर में भी अनिश्चितता के कारण विदेशी प्रोजेक्ट्स के विस्तार पर रोक लगाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वैश्विक संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर महंगाई के रूप में आम जनता पर पड़ेगा।
Posted By: Daily Suraj Bureau