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पंजाब के गांवों से लुप्त होती ‘खेस और दरियां’ की परंपरा

28 Feb, 2026 05:12 PM

पंजाब के ग्रामीण इलाकों में कभी आम जीवन का अहम हिस्सा रही हाथ से बुनी ‘खेस’ और ‘दरियां’ अब धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं। एक समय था जब माताएं अपनी बेटियों के दहेज के लिए इन्हें बड़े जतन से तैयार करती और संभालकर रखती थीं। विवाह के अवसर पर दी जाने वाली पेटी में सूटों के साथ खेस, दरियां और रजाइयां विशेष महत्व रखती थीं। लेकिन बदलती पसंद और जीवनशैली के कारण अब इन पारंपरिक वस्तुओं की मांग तेजी से घट रही है। जो चीजें कभी ग्रामीण घरों में रोजमर्रा के उपयोग या उपहार के रूप में जरूरी मानी जाती थीं, वे अब निजी खद्दर स्टोर्स में ‘बफर स्टॉक’ के रूप में पड़ी मिलती हैं। पहले ग्रामीण परिवारों में पिट-लूम या ‘पंजे’ के जरिए बुनाई का कौशल आम था, लेकिन अब यह कला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि खेस की जगह कंबलों और रजाइयों ने ले ली है, जबकि दरियों की जगह गद्दों का उपयोग बढ़ गया है। एक खद्दर स्टोर के मालिक प्रदीप कौशल के अनुसार, अब हाथ से बने इन उत्पादों के खरीदार लगभग खत्म हो चुके हैं। पहले जहां शहरी परिवार अपने पुराने उत्पाद बेचने आते थे, वहीं अब ग्रामीण परिवार भी इन्हें बेचने लगे हैं। इससे बुजुर्गों को कम कीमत मिलने पर निराशा होती है। लुधियाना के गांव पोहीड़ की निवासी शांति ने कहा कि इस पारंपरिक कला को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने जरूरी हैं, ताकि उस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जा सके जो इन वस्तुओं के विभिन्न डिजाइनों में झलकती थी। उन्होंने बताया कि दरियों में बने पशु-पक्षी, पौधे और फूल पर्यावरण के प्रति लोगों की जागरूकता को दर्शाते थे। वहीं राम शरणम इलाके की कुलदीप कौर ने अफसोस जताया कि उन्होंने अपनी भतीजी के विवाह में जो खेस और दरियां दी थीं, वे आज घर में बिना उपयोग के पड़ी हैं, क्योंकि नई पीढ़ी इनमें रुचि नहीं दिखा रही। बुजुर्गों का मानना है कि बड़े पैमाने पर प्रवास, पारंपरिक जीवनशैली में बदलाव और औद्योगिक उत्पादों की आसान उपलब्धता इस कला के पतन के मुख्य कारण हैं। लोगों ने सरकार से अपील की है कि इस पारंपरिक ग्रामीण कला को पुनर्जीवित करने के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के सहयोग से कार्यशालाएं और प्रदर्शनियां आयोजित की जाएं।

Posted By: Daily Suraj Bureau

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