सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: धर्म बदलकर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति पिछड़ा वर्ग कोटे के लाभ का दावा नहीं कर सकते
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- (Asia/Kolkata)
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछड़ी श्रेणियों से संबंधित हिंदू यदि इस्लाम धर्म अपना लेते हैं, तो वे उस श्रेणी के आरक्षण लाभों का दावा करने के अधिकारी नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पुरानी सामाजिक व्यवस्था के तहत झेले गए पिछड़ेपन को नए धर्म में आगे नहीं ले जाया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने यह भी दोहराया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता। मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रहा बरकरार न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़ी श्रेणी (मुस्लिम) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस नोटिफिकेशन को रद्द करने वाले हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमानों को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ और संवैधानिक आधार पीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत मिलने वाला कोई भी कानूनी लाभ, सुरक्षा या आरक्षण—जिसका लाभ लेना किसी विशिष्ट हिंदू सामाजिक ढांचे पर निर्भर करता है—वह व्यक्ति इस्लाम, ईसाई धर्म या किसी अन्य गैर-हिंदू सामाजिक ढांचे में जाने के बाद केवल पुरानी सदस्यता के आधार पर नहीं मांग सकता। अदालत ने कहा, "जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्म परिवर्तन करता है, वह केवल अपने धर्म परिवर्तन से पहले के दर्जे से जुड़े सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।" अदालत ने यह भी जोड़ा कि धर्म परिवर्तन के कारण किसी व्यक्ति की पुरानी जाति या सामुदायिक दर्जा स्वतः किसी नए अधिसूचित पिछड़े वर्ग की सदस्यता में नहीं बदला जा सकता।
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