हरियाणा लेबर बोर्ड घोटाला: सीबीआई अदालत ने आरोपी अकाउंट्स क्लर्क की रेगुलर जमानत अर्जी ठुकराई
- पंजाब
- (Asia/Kolkata)
हरियाणा लेबर वेलफेयर बोर्ड (HLWB) में अनुबंध (ठेके) पर तैनात एक अकाउंट्स क्लर्क द्वारा महज 50,000 रुपये की कथित रिश्वत के एवज में सरकारी फंड से 50 करोड़ रुपये के गबन में मदद करने का मामला सामने आया है। पंचकूला की एक विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले में आरोपी क्लर्क को रेगुलर जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की है कि प्रारंभिक जांच से कस्टोडियल और आपराधिक साजिश में उसकी सक्रिय संलिप्तता का साफ पता चलता है। गौरतलब है कि यह गबन 657 करोड़ रुपये के बड़े आईडीएफसी फर्स्ट बैंक-एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक घोटाले का ही एक हिस्सा है। खाता खुलवाने और साजिश का खुलासा सीबीआई की जांच के अनुसार, बचत खाता (सेविंग अकाउंट) खोलने की कोई मंजूरी न होने के बावजूद, अकाउंट्स क्लर्क अमित कुमार ने एक सह-आरोपी के निर्देश पर आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में खाता खुलवाने में पूरी मदद की थी। एजेंसी का कहना है कि वह अच्छी तरह जानता था कि एफडीआर (FDRs) तैयार करने के लिए बचत खाते की कोई आवश्यकता नहीं होती है। उसने कथित तौर पर खाता खुलवाने के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का मोबाइल नंबर और फोटो व्हाट्सएप के जरिए सह-आरोपी अभय कुमार (आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर) को मुहैया कराई थी। सीबीआई ने अदालत को बताया कि यह मोबाइल नंबर अभय कुमार के साले अभिषेक सिंगला के नाम पर पंजीकृत था और बैंक द्वारा बोर्ड के साथ होने वाले पत्राचार को छुपाने के लिए बोर्ड के नाम से मिलती-जुलती एक फर्जी ई-मेल आईडी भी बनाई गई थी। फर्जी पत्रों और चैट्स के जरिए रची गई साजिश जांच में यह भी सामने आया कि 3 मार्च 2025 का एक पत्र आईडीबीआई (IDBI) बैंक को 50 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का निर्देश देते हुए जारी किया गया था, जिसमें खाता संख्या खाली छोड़ी गई थी। बाद में यह खाता संख्या अभय कुमार द्वारा 5 मार्च 2025 को शाम 5:50 बजे व्हाट्सएप के माध्यम से दी गई और यह पत्र 6 मार्च को बैंक पहुंचा। सीबीआई ने खुलासा किया कि अन्य पत्रों के विपरीत इस अकेले पत्र पर डिस्पैच नंबर हाथ से लिखने की बजाय प्रिंट किया गया था, जो यह दर्शाता है कि पत्र नंबर प्राप्त होने के बाद ही टाइप किया गया था। इसी पत्र के आधार पर पैसे ट्रांसफर किए गए और लगभग 15 दिनों के भीतर धोखाधड़ी से निकाल लिए गए। अमित कुमार ने अभय कुमार से व्हाट्सएप के जरिए एक फर्जी ब्याज प्रमाण पत्र (Interest Certificate) भी प्राप्त किया और उसे बोर्ड के खाते में असली के रूप में इस्तेमाल किया। हालांकि 6 मई 2025 को उसे बैंक खाते में सही बैलेंस और अन्य गड़बड़ियों की जानकारी मिल चुकी थी, लेकिन उसने उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना नहीं दी और अपराध को छुपाने के लिए अपनी चैट डिलीट कर दी। हालांकि, अभय कुमार के फोन से रिकवर की गई चैट्स से अमित कुमार के खाते में 50,000 रुपये के नकद भुगतान का खुलासा हुआ है। अदालत का फैसला आरोपी के वकील ने दलील दी कि अमित कुमार की भूमिका सीमित थी और उसके पास कोई स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सीबीआई के विशेष जज विजयेन्त सहगल ने अपराध की गंभीरता और व्यापकता को देखते हुए अमित कुमार की रेगुलर जमानत अर्जी खारिज कर दी है।
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