सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पैदल यात्रियों के अधिकारों को मिले प्राथमिकता, बने स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पैदल यात्रियों के अधिकारों को मिले प्राथमिकता, बने स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी

सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने के नागरिकों के मौलिक अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था (रेगुलेटरी बॉडी) गठित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर चलना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है और इसे मोटर वाहनों की आवाजाही की तुलना में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि यदि किसी नागरिक के इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो उसे प्रभावी सुधारात्मक उपाय प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। पीठ ने कहा कि निर्धारित फुटपाथों पर चलने के मौलिक अधिकार को बेहतर और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक नियामक संस्था का गठन अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि ऐसी संस्था निरंतर कार्य करते हुए संस्थागत अनुभव विकसित करेगी और उसे संरक्षित रखेगी। इससे वह अपने द्वारा एकत्रित किए गए अनुभव, आंकड़ों और अन्य महत्वपूर्ण सूचनाओं के आधार पर प्रभावी निर्णय लेने में सक्षम होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संस्थागत विशेषज्ञता किसी भी नियामक व्यवस्था की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत के अनुसार, प्रस्तावित रेगुलेटर संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों और योग्य मानव संसाधनों की सेवाएं लेकर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से कार्य करेगा। पीठ ने आगे कहा कि यह नियामक संस्था सरकारी या औद्योगिक नियंत्रण से मुक्त रहकर संस्थागत ईमानदारी बनाए रखेगी। अदालत का मानना है कि यदि ऐसी संस्था पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों पर कार्य करेगी, तो ये मूल्य स्वतः उसके कामकाज में दिखाई देंगे। इसी दृष्टिकोण के साथ पैदल चलने के मौलिक अधिकार को व्यवहारिक रूप से लागू करने की आवश्यकता है।