रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन तक का सफर : एक सर्जन की व्यक्तिगत यात्रा ने बदली घुटनों के इलाज की दिशा* डॉ. एन. के. अग्रवाल

रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन तक का सफर : एक सर्जन की व्यक्तिगत यात्रा ने बदली घुटनों के इलाज की दिशा* डॉ. एन. के. अग्रवाल

भारतीय घरों में घुटनों का दर्द अक्सर उम्र बढ़ने का एक सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। इसकी शुरुआत हल्की परेशानी से होती है जैसे सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत, बैठने या खड़े होने में दर्द—लेकिन धीरे-धीरे यह चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगता है। लंबे समय से इसका इलाज लगभग तय रहा है: जब दवाइयों, फिजियोथेरेपी और इंजेक्शन से राहत नहीं मिलती, तो नी रिप्लेसमेंट को अगला कदम माना जाता है। लेकिन अब यह सोच बदलती हुई नजर या रही है। डॉ. एन. के. अग्रवाल, एक अनुभवी आर्थोपेडिक सर्जन जिनके पास 50 से अधिक वर्षों का अनुभव है और जो भारत में नी रिप्लेसमेंट के शुरुआती विशेषज्ञों में से रहे हैं, पहले इसी समाधान में पूरी तरह विश्वास रखते थे। उन्होंने भारत, यूके, यूरोप और अमेरिका के प्रमुख संस्थानों में प्रशिक्षण और काम किया है, और लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में आर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर के रूप में सेवा दी है। अपने करियर में उन्होंने हजारों सर्जरी की हैं और कई मरीजों को चलने-फिरने की क्षमता वापस दिलाई है। लेकिन समय के साथ उन्हे एक बात खटकने लगी, जो थी ऑपरेशन के बाद मरीजों में संतुष्टि। करीब 15–20 वर्षों तक लगातार नी रिप्लेसमेंट करने के बाद उन्होंने पाया कि सर्जरी सफल होने के बावजूद, लगभग 20–25 प्रतिशत मरीज पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते। कई मामलों में दर्द या जकड़न बनी रहती है और चलने-फिरने की क्षमता पहले जैसी नहीं हो पाती। तकनीक में सुधार, रोबोटिक्स और नई विधियों ने सर्जरी को अधिक सटीक तो बनाय, लेकिन मरीजों की संतुष्टि में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। यहीं से यह सवाल उठा कि क्या इलाज समस्या की जड़ तक पहुंच भी रहा है या नहीं। इसी दौरान एक व्यक्तिगत अनुभव ने उनकी सोच को और स्पष्ट कर दिया। करीब दस साल पहले उनकी पत्नी, जो खुद डॉक्टर हैं, को गंभीर घुटनों का दर्द होने लगा। हालत इतनी बिगड़ गई कि उनका चलना मुश्किल हो गया और यात्रा के लिए व्हीलचेयर की जरूरत पड़ने लगी। विशेषज्ञों ने उन्हें भी नी रिप्लेसमेंट की सलाह दी, लेकिन डॉ. अग्रवाल ने तुरंत यह फैसला नहीं लिया। अपने अनुभव से वह जानते थे कि सफल सर्जरी भी संतोषजनक परिणाम की गारंटी नहीं होती और उन्होंने इस समस्या को गहराई से समझने का निर्णय लिया। जब उन्होंने दुनियाभर के शोध को विस्तार से देखा, तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आई। घुटनों का दर्द केवल घिसाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह शरीर में होने वाली धीमी और लगातार सूजन से जुड़ा होता है, जो उम्र के साथ बढ़ती है, जिसे “इनफ्लेमेजिंग” कहा जाता है। यह सूजन केवल घुटने के कार्टिलेज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लिगामेंट, मांसपेशियों और आसपास के ऊतकों को भी प्रभावित करती है। इस तरह घुटनों का दर्द केवल एक जोड़ की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर से जुड़ी स्थिति का हिस्सा बन जाता है। यहीं से इलाज की दिशा में बदलाव शुरू हुआ और डॉ. अग्रवाल ने “रिप्लेसमेंट” के बजाय “रीजेनरेशन” पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कई ऐसे उपचारों को एक साथ जोड़ा, जिन्हें पहले अलग-अलग अपनाया जाता था। इसमें जोड़ों की सफाई, लुब्रिकेशन थेरेपी, पीआरपी ...