हरभजन मान: चार दशकों से पंजाबी संगीत और सिनेमा में कायम है उनका प्रभाव
- पंजाब
- (Asia/Kolkata)
पंजाबी संगीत और सिनेमा की दुनिया में हरभजन मान का नाम पिछले चार दशकों से प्रमुखता से लिया जाता है। कविशरी, गायकी और अभिनय के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले हरभजन मान, शिरोमणि कविशर करनैल पारस की विरासत को आगे बढ़ाने वाले कलाकार हैं। वह प्रसिद्ध गीतकार बाबू सिंह मान को अपना मार्गदर्शक मानते हैं। उनकी गायकी में लोक परंपरा, पारिवारिक रिश्तों, जीवन की सच्चाइयों और पंजाब से जुड़ाव की झलक मिलती है। भड़कीलेपन, अश्लीलता, हथियारों और नशे को बढ़ावा देने वाले गीतों से दूर रहकर उन्होंने सार्थक और परिवार के साथ सुने जा सकने वाले गीतों के जरिए श्रोताओं का विश्वास जीता है।
बचपन से शुरू हुआ कविशरी और गायकी का सफर
जिला बठिंडा के गांव खेमूआणा में जन्मे हरभजन मान और उनके भाई गुरसेवक मान ने वर्ष 1976-77 में बचपन में ही कविशरी गाना शुरू कर दिया था। उनके पिता हरनेक सिंह मान का इस दिशा में अहम प्रभाव रहा। दोनों भाइयों ने शिरोमणि कविशर करनैल सिंह पारस के कविशरी जत्थे को देखकर इस कला की ओर कदम बढ़ाया। पारस के मार्गदर्शन ने हरभजन मान की गायकी को तराशने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘हंसों की जोड़ी’ और ‘भगत सिंह की घोड़ी’ जैसी कविशरी रचनाओं से शुरुआत करने वाले दोनों भाइयों में बड़े हरभजन मान को 1990 के दशक की शुरुआत में ‘चिट्ठिए नी चिट्ठिए’ गीत से व्यापक लोकप्रियता मिली। मां और बेटे के रिश्ते को भावनात्मक ढंग से पेश करने वाले इस गीत ने उन्हें पंजाबी श्रोताओं के बीच खास पहचान दिलाई। हालांकि, उनकी पहली एल्बम ‘इश्क दे मामले’ वर्ष 1988 में आई थी। यह एल्बम बापू पारस द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध किस्सों पर आधारित थी।
रिश्तों, लोक परंपरा और जीवन की सच्चाइयों की आवाज
हरभजन मान ने अपने करियर में अधिकतर गीत करनैल पारस और बाबू सिंह मान ‘मराड़ां वाले’ की रचनाओं पर गाए हैं। उनकी गायकी में पारिवारिक अपनापन, लोक तत्व, जीवन के कड़वे सच, लोक गाथाएं और तर्कपूर्ण विचार प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनकी आवाज में कविशरों जैसी बुलंदी के साथ दर्द और संवेदनशीलता भी सुनाई देती है।
जब हरभजन मान महज 10 वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया था। मां को लेकर गाए उनके गीतों में इस व्यक्तिगत पीड़ा की झलक मिलती है। ‘किथे गईयां मां साडे हिस्से दियां लोरियां’ जैसे गीत के जरिए उन्होंने मां के स्नेह और उसकी कमी को शब्द दिए। मां के रिश्ते पर आधारित उनके गीतों को श्रोताओं ने खूब पसंद किया। कुलदीप माणक के प्रसिद्ध गीत ‘मां हुंदी है मां ओ दुनिया वालियो’ के बाद इस विषय पर हरभजन मान के गीतों को भी व्यापक लोकप्रियता मिली।
‘बाबुल मेरियां गुड्डियां तेरे घर रह गईयां’, ‘रोंदी कूंज विछड़ के डारों’ और ‘अंबी दा बूटा’ जैसे गीत बेटी की विदाई के बाद माता-पिता और बेटी के मन में उठने वाले भावों को सामने लाते हैं। वहीं, विजय धम्मी का लिखा गीत ‘आ सोहणिया वे जग जिउंदियां दे मेले’ हरभजन मान की आवाज में रिकॉर्ड होने के बाद लोकगीत जैसा लोकप्रिय हो गया।
‘जग जंक्शन रेलां दा’, ‘मौत दी कली’, ‘चहुं कु दिनां दा मेला’, ‘मानां मार जाणां, पिछे यादां रह जांणियां’ और ‘गुझ्जे नेतर’ जैसे गीतों में उन्होंने जीवन की अनिश्चितता, जन्म और मृत्यु जैसे विषयों को उठाया। ‘मैं पंजाब बोलदा हां’ जैसे गीत पंजाब के प्रति उनकी चिंता और जुड़ाव को दर्शाते हैं। लोक तत्वों से भरपूर ‘तिन्न रंग नहीं लभ्भणे’ गीत डीजे पर भी खूब बजाया जाता है। ‘सानूं बड़ा प्यारा लगदा है तेरे वालां विचला चीर कुड़े’ के जरिए उन्होंने अंधविश्वासों पर व्यंग्य किया। ‘भिज्ज गई कुड़ती लाल’ 1990 के दौर के लोकप्रिय पॉप गीतों में शामिल रहा। इसके अलावा ‘गल्लां गोरियां’, ‘लाला लाला लाला’, ‘लाली’ और ‘हाय मेरी बिल्लो’ जैसे गीतों ने उन्हें पॉप गायकी में भी पहचान दिलाई।
कविशरी और धार्मिक गायकी से जुड़ाव
सफल गायकी के सफर के दौरान हरभजन मान और गुरसेवक मान की ‘सतरंगी पींघ’ शीर्षक से आई एल्बमों ने कविशरी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को उजागर किया। हरभजन मान की गायकी में धार्मिक विषयों का भी खास स्थान रहा है। कुछ वर्ष पहले उन्होंने मनप्रीत टिवाणा का लिखा गीत ‘लोको अपने बच्चियां नूं सरहिंद विखा के लियाओ’ गाया। इसके अलावा उन्होंने ‘पंथ तेरे दियां गूंजां’, ‘राज करेगा खालसा’ और ‘अमृत दा बाटा’ नाम से तीन धार्मिक कैसेट भी श्रोताओं को समर्पित कीं।
‘जी आइयां नूं’ से पंजाबी सिनेमा को मिली नई पहचान
कविशरी और गायकी में पहचान बनाने के बाद हरभजन मान ने फिल्मों की ओर रुख किया। करीब दो दशक पहले, जब पंजाबी सिनेमा कठिन दौर से गुजर रहा था, तब उनकी फिल्म ‘जी आइयां नूं’ ने दर्शकों को दोबारा पंजाबी फिल्मों की ओर आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाई।
इसके बाद ‘असां नूं माण वतनां दा’, ‘दिल अपना पंजाबी’, ‘मिट्टी वाजां मारदी’, ‘मेरा पिंड माई होम’, ‘जग जिउंदियां दे मेले’, ‘हीर रांझा’, ‘यारा ओ दिलदारा’, ‘हानी’, ‘गद्दार: दि ट्रेटर’, ‘साडे सीएम साब’ और ‘पीआर’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने पंजाबी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। इन फिल्मों में पंजाबी संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों, प्यार, गांवों, विदेश में बसने और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने जैसे विषय प्रमुख रहे।
उनकी फिल्मों और गीतों ने विदेशों में रहने वाले पंजाबियों की भावनाओं को भी पर्दे पर जगह दी। पंजाबी फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता के दौर में अब औसतन हर सप्ताह एक पंजाबी फिल्म रिलीज हो रही है। पंजाबी सिनेमा की इस यात्रा में हरभजन मान के योगदान को महत्वपूर्ण माना जाता है।
बेटे अवकाश मान की फिल्मी शुरुआत
हरभजन मान अब अपने बेटे अवकाश मान को भी फिल्मी दुनिया में आगे बढ़ा रहे हैं। अवकाश मान की पहली फिल्म ‘इह दिन रोज़ नी आने’ 9 अक्टूबर को रिलीज हुई। इस फिल्म में अवकाश मान नायक की भूमिका में हैं, जबकि हरभजन मान चरित्र अभिनेता के रूप में नजर आए हैं।
फिल्म का ट्रेलर जारी करने के लिए हरभजन मान ने अपने बेटे की इच्छा पर अपने पैतृक गांव खेमूआणा को चुना। ट्रेलर रिलीज का कार्यक्रम एक सांस्कृतिक मेले जैसा बन गया। वहां शामियाने लगाए गए, हलवाई की व्यवस्था की गई और मेहमानों का स्वागत जलेबियों तथा पकौड़ों से किया गया। इस अवसर पर हरभजन मान और अवकाश मान ने पिता-पुत्र की जोड़ी के रूप में ‘जग जंक्शन रेलां दा’ कविशरी भी प्रस्तुत की।
इस गांव और घर का हरभजन मान के पारिवारिक तथा सांस्कृतिक इतिहास से गहरा संबंध है। एक समय यहां शिरोमणि कविशर करनैल सिंह पारस अपने साथियों रणजीत सिंह सिद्धवां, चंद सिंह जंडी और करतार सिंह मंडी कलां के साथ आया करते थे। हरभजन मान के पिता हरनेक सिंह मान के भोग के अवसर पर भी हरभजन और गुरसेवक मान ने कविशरी प्रस्तुत की थी। बेटे की फिल्म के ट्रेलर को पैतृक गांव में जारी करने का यह आयोजन पंजाबी फिल्म जगत के लिए एक अलग तरह का कार्यक्रम रहा और इस मौके पर हरभजन मान भावुक भी हुए।
पंजाबी संस्कृति से जुड़ी विरासत
हरभजन मान की गायकी और फिल्मों में पंजाबी संस्कृति, परिवार, प्रेम, प्रवास और अपनी मिट्टी से लगाव जैसे विषय लगातार दिखाई देते हैं। उनकी खासियत यह रही है कि उन्होंने लोकप्रियता के साथ-साथ लोक परंपरा और पारिवारिक मूल्यों को भी अपनी कला का हिस्सा बनाए रखा।
‘जी आइयां नूं’ से लेकर ‘इह दिन रोज़ नी आने’ तक उनका सफर पंजाबी दर्शकों की भावनाओं और विदेशों में रहने वाले पंजाबियों के अपनी जन्मभूमि से रिश्ते को सामने लाता है। अब अपने बेटे अवकाश मान के साथ नई पीढ़ी को फिल्मी दुनिया में आगे बढ़ाते हुए हरभजन मान पंजाबी संगीत और सिनेमा में अपनी अलग विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
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