प्रकृति और पानी का महत्व: आधुनिक मानव के सामने बढ़ती चुनौती
धरती सौरमंडल के ग्रहों में ऐसा एकमात्र ग्रह मानी जाती है जहां जीवन की मौजूदगी संभव है। वैज्ञानिक लगातार चंद्रमा और मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की खोज में लगे हुए हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वहां जीवन संभव है या नहीं। प्रकृति ने पृथ्वी को इस तरह बनाया है कि वह यहां रहने वाले जीवों की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सके। यही कारण है कि पृथ्वी को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है। मानव जीवन की मूलभूत जरूरतों में सांस लेने के बाद भोजन, वस्त्र और आवास आते हैं, लेकिन इन सब से पहले पानी का महत्व अत्यधिक है। सांस लेने के बाद मनुष्य लंबे समय तक पानी के बिना जीवित नहीं रह सकता। पानी प्रकृति की अनमोल देन है, जिसे पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों को मुफ्त में उपलब्ध कराया गया है। हालांकि विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ-साथ मानव की बढ़ती लालसा ने पानी को भी बोतलों में बंद कर बाजार की वस्तु बना दिया है। वैज्ञानिक दृष्टि से पानी का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक गैसों से मिलकर बना है, जिसका रासायनिक सूत्र H₂O है। इसका अर्थ है कि पानी दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन के परमाणुओं से मिलकर बनता है। पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत और उसके विकास में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास बताता है कि दुनिया की अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे विकसित हुईं। पानी ने मानव जीवन को इतना प्रभावित किया कि कई क्षेत्रों के नाम भी नदियों और जल स्रोतों से जुड़े। उदाहरण के तौर पर पंजाब का प्राचीन नाम ‘सप्त सिंधु’ था, जिसका अर्थ सात नदियों की भूमि है। बाद में इसे ‘पंजाब’ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ पांच नदियों की धरती है। हालांकि समय के साथ राजनीतिक और भौगोलिक विभाजन के कारण यह क्षेत्र अब पहले की तुलना में सीमित जल स्रोतों तक सिमट गया है। पानी का प्रभाव केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि धरती पर मौजूद हर जीव-जंतु और पक्षी इसके महत्व से प्रभावित होते हैं। जहां अधिक पानी होने पर बाढ़ जैसी आपदाएं आती हैं, वहीं बारिश की कमी होने पर सूखा पड़ता है। हाल के वर्षों में मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी अचानक भारी बारिश होती है तो कभी लंबे समय तक सूखा रहता है। कभी तेज गर्मी और कभी घना कोहरा, मौसम की यह अनिश्चितता पर्यावरणीय असंतुलन की ओर संकेत करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति के साथ मानव की बढ़ती छेड़छाड़ भी इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है। जंगलों की कटाई, बड़े-बड़े निर्माण कार्य और नदियों के प्राकृतिक मार्गों में हस्तक्षेप ने पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर नदियों के रास्तों में निर्माण कार्य किए गए और जलधाराओं की दिशा बदल दी गई। विशाल नदियों को संकीर्ण नहरों में बहने के लिए मजबूर किया गया, जिसके कारण बाढ़ जैसी समस्याएं भी सामने आने लगी हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार प्रकृति के साथ किए गए ऐसे हस्तक्षेपों के परिणाम भविष्य में और गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं। इसलिए समय रहते प्रकृति की ओर लौटना और उसके संरक्षण को प्राथमिकता देना आवश्यक माना जा रहा है। जल के महत्व को समझाने और इसके संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। यह पहल 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य पानी के संरक्षण, उसके सही उपयोग और जरूरतमंद लोगों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में जल संरक्षण और जल के न्यायसंगत वितरण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पानी का उपयोग समझदारी से नहीं किया गया तो भविष्य में इसकी हर बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है।
Posted By: Daily Suraj Bureau