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सीबीआई के अधिकार क्षेत्र पर बढ़ता विवाद: संघवाद बनाम केंद्रीकरण

03 Apr, 2026 07:41 AM

भारत के संघीय ढांचे में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का राज्यों पर अधिकार क्षेत्र एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है। यह विवाद केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक, संवैधानिक और नैतिक प्रश्न भी शामिल हैं। हाल के वर्षों में कई राज्यों, विशेषकर विपक्ष शासित राज्यों द्वारा सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस लेने के फैसलों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। इससे यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या सीबीआई वास्तव में एक निष्पक्ष एजेंसी है या केंद्र सरकार के प्रभाव में काम कर रही है। वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य राजनीतिक कारणों से जांच में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। सीबीआई की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को समझने के लिए दिल्ली स्पेशल पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (डीएसपीई एक्ट) महत्वपूर्ण है। यह कानून सीबीआई को कानूनी आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, किसी राज्य में जांच करने के लिए सीबीआई को राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होती है। यह प्रावधान संघीय ढांचे में राज्यों की स्वायत्तता को दर्शाता है। हालांकि, यह सहमति पूर्ण नहीं है और कुछ परिस्थितियों में सीबीआई बिना राज्य की अनुमति के भी जांच कर सकती है। उदाहरण के तौर पर, यदि सर्वोच्च न्यायालय या संबंधित उच्च न्यायालय सीबीआई जांच का आदेश देता है, तो राज्य की सहमति आवश्यक नहीं होती। इसके अलावा, केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों या केंद्रीय कानूनों के उल्लंघन से संबंधित मामलों में भी सीबीआई स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर सकती है। वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया गया कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए राज्य की अनुमति जरूरी नहीं है। यह निर्णय राष्ट्रीय हित और न्यायिक प्रक्रिया की प्राथमिकता को दर्शाता है। संविधान के संघीय ढांचे के तहत कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय है, लेकिन अनुच्छेद 246 और 254 के तहत विशेष परिस्थितियों में केंद्र की भूमिका प्रमुख हो जाती है। यही बिंदु केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का कारण बनता है। जहां राज्य अपनी स्वायत्तता का हवाला देते हैं, वहीं केंद्र राष्ट्रीय हित में हस्तक्षेप को आवश्यक बताता है। 2018 के बाद से पश्चिम बंगाल, पंजाब, तेलंगाना, केरल, झारखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। पहले इस सहमति के तहत सीबीआई बिना अलग अनुमति के जांच शुरू कर सकती थी, लेकिन अब हर मामले में अलग मंजूरी लेनी पड़ती है, जिससे जांच प्रक्रिया धीमी हो गई है। राज्यों का आरोप है कि केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए करती है। कई मामलों में विपक्षी नेताओं के खिलाफ अचानक जांच शुरू होने और सत्ताधारी दल से जुड़े मामलों में ढिलाई बरतने के आरोप लगे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने 2019 में सहमति वापस लेते समय इसी तरह की चिंताएं जताई थीं। अन्य राज्यों ने भी इसे अपनी स्वायत्तता की रक्षा के कदम के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य सरकारें सहमति रोककर भ्रष्टाचार और अपराध की जांच में बाधा डाल रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में भी इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी और कहा था कि सामान्य सहमति वापस लेने से जटिल और अंतरराज्यीय अपराधों की जांच प्रभावित होती है। इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर पड़ने वाला प्रभाव है। जब किसी एजेंसी पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है और यदि यह प्रभावित होती है, तो न्याय प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगते हैं। इसके अलावा, राज्यों द्वारा सहमति वापस लेने की प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्तर पर अपराध नियंत्रण और भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों को कमजोर कर सकती है। ऐसे मामलों में एक मजबूत और स्वतंत्र केंद्रीय जांच एजेंसी की आवश्यकता होती है, खासकर जब अपराध कई राज्यों में फैले हों। विशेषज्ञों के अनुसार, समाधान टकराव में नहीं बल्कि संतुलन और सहयोग में निहित है। सबसे पहले, सीबीआई की वास्तविक स्वायत्तता सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करना जरूरी है। दूसरे, डीएसपीई अधिनियम में संशोधन कर एक स्पष्ट और संतुलित प्रणाली विकसित की जा सकती है, जिसमें राज्यों को सहमति देने या न देने के लिए समय सीमा तय की जाए। तय समय के भीतर निर्णय न होने पर इसे स्वीकृति माना जा सकता है, जिससे जांच में अनावश्यक देरी रोकी जा सके। तीसरे, अंतर-राज्यीय परिषद जैसी संस्थाओं को सक्रिय कर संवाद के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाना चाहिए। सहकारी संघवाद का अर्थ यही है कि केंद्र और राज्य मिलकर समस्याओं का समाधान करें। अंततः, सीबीआई का अधिकार क्षेत्र केवल कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है। न तो पूर्ण केंद्रीकरण और न ही पूर्ण विकेंद्रीकरण उचित है। एक संतुलित, पारदर्शी और सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही इस विवाद का स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है।

Posted By: Daily Suraj Bureau

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