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जलवायु परिवर्तन का बड़ा अलर्ट: पिछले 7 दशकों में अधिक गर्म और शुष्क हुआ पंजाब समेत उत्तर-पश्चिम भारत, धान की खेती पर पड़ेगा असर

24 Oct, 2026 08:57 AM

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (IITM), पुणे के एक संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पिछले सात दशकों (1951 से 2020) के दौरान पंजाब समेत उत्तर-पश्चिम भारत काफी अधिक गर्म और शुष्क हो गया है। शोध के अनुसार, शुष्क क्षेत्र का विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बढ़कर अब पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैल गया है, जबकि इसके विपरीत दक्षिण भारत का अधिकांश हिस्सा पहले की तुलना में अधिक नम हो गया है। कृषि और धान की फसल पर प्रभाव की चेतावनीमौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु में आया यह बदलाव उत्तरी मैदानी इलाकों में मुख्य रूप से धान की खेती को प्रभावित कर सकता है। इससे फसलों की बुआई और कटाई की समय-सारणी (शेड्यूल) में बदलाव की आवश्यकता हो सकती है, जिसकी बारीकी से निगरानी बेहद जरूरी है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को कवर करने वाले उत्तर-पश्चिम भारत में गर्म अर्ध-शुष्क (Hot Semi-Arid) क्षेत्र का दायरा 1951-1980 के दौरान कुल क्षेत्रफल के लगभग एक-चौथाई (25%) से बढ़कर 1991-2020 में एक-तिहाई (लगभग 33%) हो गया है। तापमान में वृद्धि और कम बारिश के कारणअध्ययन के मुताबिक, तापमान बढ़ने और वर्षा में आई कमी के कारण इस क्षेत्र का लगभग 7 प्रतिशत के बराबर हिस्सा अधिक शुष्क क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। शोधकर्ताओं ने 1981 से 2020 के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के गंगा मैदानी क्षेत्रों में वर्षा के आंकड़ों की तुलना समुद्री सतह के तापमान से की। इसमें पाया गया कि कम बारिश वाले वर्ष 'विक्टोरिया मोड' (उत्तरी प्रशांत महासागर में गर्म और ठंडे पानी का एक आवर्ती पैटर्न) से मेल खाते हैं, जो उत्तर भारत से नमी को दूर खींच लेता है।आईएमडी पुणे की वैज्ञानिक और इस अध्ययन की मुख्य लेखिका अनन्या कर्माकर ने बताया कि जब 1951 से 2020 तक दशक-दर-दशक भारत के जलवायु मानचित्र की तुलना की गई, तो सबसे स्पष्ट बदलाव उत्तर भारत में देखा गया। चूंकि यह देश के सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में से एक है, इसलिए यहां फसलों की बीजाई और कटाई के समय पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। कमजोर मानसून और एल नीनो का असरयह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब हालिया मानसून रिपोर्ट के अनुसार 2015 के बाद का सबसे कमजोर मानसून दर्ज किया गया, जो सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रहा। प्रशांत महासागर का समय-समय पर गर्म होना, जिसे 'एल नीनो' (El Niño) कहा जाता है, इस कमजोर मानसून का एक मुख्य कारण था। इसके चलते महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के बड़े हिस्सों में सूखा भी घोषित किया गया। अध्ययन के सह-लेखक और आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने कहा कि सात दशकों के रिकॉर्ड से साबित होता है कि भारत के जलवायु क्षेत्र एक ही पीढ़ी के जीवनकाल में बदल गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ जैसे स्थानों पर अब कमजोर मानसून 1960 के दशक की तुलना में अधिक शुष्क माहौल में आता है। आईएमडी इन दीर्घकालिक आंकड़ों का उपयोग किसानों को जारी की जाने वाली मौसम सलाह और अपने मौसमी पूर्वानुमानों को और बेहतर बनाने के लिए करेगा।

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