किशाऊ प्रोजेक्ट से पंजाब बाहर: मान सरकार ने कसी कमर, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी
केन्द्र सरकार द्वारा किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना (Kishau Multipurpose Project) से पंजाब को बाहर रखे जाने के फैसले के खिलाफ पंजाब सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख करने की पूरी तैयारी कर ली है। राज्य सरकार द्वारा शीर्ष अदालत में दायर की जाने वाली याचिका के मसौदे (ड्राफ्ट) को अंतिम रूप दिया जा रहा है। गौरतलब है कि 15 सितंबर को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। पंजाब सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार ने उसे विश्वास में लिए बिना यमुना बेसिन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाया है, जिसके खिलाफ अब कानूनी लड़ाई लड़ने की रणनीति बनाई गई है। जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, एडवोकेट जनरल (AG) कार्यालय को याचिका के ड्राफ्ट को औपचारिक मंजूरी देने के लिए पत्र भेजा गया है। इस मसौदे की जांच पूर्व एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ वकीलों द्वारा पहले ही की जा चुकी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान इससे पहले भी केंद्र की बैठकों में यमुना के पानी पर पंजाब के अधिकार का मुद्दा उठा चुके हैं और इस संबंध में प्रधानमंत्री सहित केंद्र सरकार को पांच पत्र भी लिख चुके हैं। किशाऊ प्रोजेक्ट और पंजाब के मुख्य तर्क यमुना की सहायक नदी 'टोंस' पर निर्मित होने वाली किशाऊ परियोजना की क्षमता 422 मेगावाट बिजली उत्पादन की है। इसके माध्यम से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी और इसमें 1,562 मिलियन घन मीटर जल भंडारण की क्षमता होगी। इस परियोजना के लाभ केवल छह भागीदार राज्यों में वितरित किए जाने से पंजाब को बड़ा झटका लगा है। पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट में तर्क देगी कि 12 मई 1994 को हुए यमुना जल बंटवारा समझौते के आधार पर उसे इस परियोजना से बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि पंजाब उस समझौते का हिस्सा ही नहीं था। 12 मार्च 1954 को अविभाजित पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच हुए समझौते के अनुसार पंजाब यमुना के दो-तिहाई पानी का हकदार था। इसके अलावा, 1972 की सिंचाई आयोग की रिपोर्ट में भी पंजाब को यमुना बेसिन का हिस्सा माना गया है। राज्य सरकार की दलील है कि यदि 1966 के पुनर्गठन के बाद हरियाणा रावी-ब्यास नदियों के तट पर न होने के बावजूद उत्तराधिकारी राज्य के रूप में उनका पानी ले सकता है, तो पंजाब को भी यमुना के जल के मामले में उत्तराधिकारी राज्य के रूप में अधिकार मिलना चाहिए। साथ ही, 1994 के समझौते की धारा 8 के तहत वर्ष 2025 के बाद समीक्षा का प्रावधान है, जिसमें पंजाब अपने दावे पर पुनर्विचार चाहता है। पहले भी की गई थी ट्रिब्यूनल की मांग उल्लेखनीय है कि पंजाब सरकार ने पिछले वर्ष 25 अप्रैल को 'अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956' के तहत केंद्र के पास शिकायत दर्ज कराकर एक अलग ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग की थी। केंद्र द्वारा इस पर कोई कार्रवाई न किए जाने और हाल ही में छह राज्यों के साथ समझौता हस्ताक्षरित होने के बाद पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर, इस समझौते के बाद पंजाब सरकार की शुरुआती चुप्पी पर विपक्षी दलों और विशेषज्ञों द्वारा सवाल भी उठाए जा रहे थे, जिसके बाद अब सरकार ने कानूनी कदम उठाने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
Posted By: Daily Suraj Bureau